उत्तरी अमेरिकी और यूरोपीय देशों के साझा सैन्य गठबंधन NATO की तर्ज पर अब दुनिया के सबसे ताकतवर खाड़ी और मुस्लिम देश “अरब-नाटो” बनाने की तैयारी में हैं।
हाल ही में कतर पर इजरायल के हमले के बाद दोहा में बुलाई गई आपात बैठक में मुस्लिम देशों ने इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के अलावा अरब-नाटो पर भी चर्चा की।
इस बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और यूएई सहित 60 मुस्लिम देशों ने हिस्सा लिया था। बैठक के दौरान अरब देशों में सबसे बड़ी सेना रखने वाले मिस्र ने अरब-नाटो के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने पर अन्य देशों का समर्थन मांगा।
क्या है ‘अरब-NATO’?
कतर की राजधानी में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान मिस्र अरब देशों के लिए नाटो जैसे सामूहिक रक्षा समूह के लिए नए सिरे से प्रयास करता नजर आया।
इस समूह का प्रस्ताव पहली बार 2015 में शर्म अल शेख में आयोजित अरब लीग शिखर सम्मेलन में रखा गया था। तब यमन संघर्ष और ISIS के उदय के बीच मिस्र ने एक संयुक्त अरब सेना का विचार रखा था।
तब से यह विचार संप्रभुता संबंधी चिंताओं, क्षेत्रीय अशांति और सैन्य बाधाओं की वजह से अटका हुआ था।
हालांकि पर दोहा पर इजरायली हमले के बाद अरब देश इसकी जरूरत महसूस कर रहे हैं। इजरायल के हवाई हमलों में हमास के पांच लोग और एक कतरी सुरक्षा अधिकारी मारे गए थे।
मिस्र की पेशकश
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मिस्र ने प्रस्तावित गठबंधन को “अरब-नाटो” का नाम दिया है। मिस्र ने इस समूह के लिए शुरुआत में 20,000 सैनिकों का योगदान देने की पेशकश की है।
वहीं मिस्र की राजधानी काहिरा को अरब-नाटो का मुख्यालय बनाने और एक मिस्र के एक हाई रैंक जनरल को कमांडर बनाने की भी पेशकश की गई है।
समूह के नेतृत्व की कमान अरब लीग के 22 सदस्य बारी-बारी से संभालेंगे।
वहीं सऊदी अरब भी एक प्रमुख भागीदार हो सकता है, जो संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे खाड़ी देशों को फंड और उन्नत तकनीकों के लिए आकर्षित कर सकता है।
सुरक्षा पर केंद्रित
प्रस्ताव के तहत अरब-नाटो खुद को इजरायल के खिलाफ एक आक्रामक समूह के बजाय एक रक्षात्मक समूह के रूप में प्रस्तुत करेगा।
अरब नाटो का उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आतंकवाद या खतरा पैदा करने वाले किसी भी अन्य खतरे को रोकना होगा।
बैठक के दौरान इराकी प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-सुदानी ने भी नाटो-शैली के सामूहिक सुरक्षा समूह की वकालत की। उन्होंने कहा, “किसी भी अरब या इस्लामी देश की सुरक्षा और स्थिरता हमारी सामूहिक सुरक्षा का अभिन्न अंग है।”
भारत के लिए चिंता?
इस बैठक में पाकिस्तान और तुर्की ने भी हिस्सा लिया था, जो भारत के लिए एक खतरे की घंटी हो सकती थी।
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि संयुक्त रक्षा समझौते को सक्रिय करने का संकल्प महज बातचीत है और खाड़ी देशों के लिए इसे जमीनी हकीकत बनाना बेहद मुश्किल है।
बैठक के दौरान भी अरब-नाटो के प्रस्ताव का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। जहां मिस्र अरब नाटो का समर्थन कर रहा है, वहीं शिया ईरान इसे एक व्यापक इस्लामी रूप देना चाहता है।