कस्टोडियल डेथ मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: छत्तीसगढ़ DGP को लेकर कही अहम बात, जानिए क्या कहा…

नई दिल्ली। कस्टडी में हुई मौत के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की लापरवाही का संज्ञान लेते हुए अदालत ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम की कार्यशैली पर भी कड़ी टिप्पणी की और उन्हें “पूरी तरह से अयोग्य” करार दिया।

भौगोलिकसंदर्भ

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने दायर किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस कस्टडी में टॉर्चर के कारण उनके पति और पिता की मौत हुई। हालांकि व्यक्ति की मौत जनवरी 2024 को हुई थी, लेकिन इस मामले में एफआईआर 30 जुलाई 2026 को दर्ज की गई।

हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट पहुंचे परिजन

मृतक के परिजनों ने सबसे पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पुलिस कस्टडी में हुई मौत की निष्पक्ष जांच तथा 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने या आरोपों की जांच के लिए कोई निर्देश दिए बिना 1 लाख रुपये का मुआवजा देकर मामले का निपटारा कर दिया। इस वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। राज्य की ओर से जवाबी हलफनामा दायर किया गया, लेकिन उसमें यह नहीं बताया गया कि एफआईआर दर्ज करने और मृतक की कस्टडी में हुई मौत की जांच के लिए क्या कदम उठाए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पूर्व आदेश में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया 1 लाख रुपये का मुआवजा “पूरी तरह से अपर्याप्त” है और मृतक के परिवार को हुई क्षति की गंभीरता के अनुरूप “उचित नहीं” है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए समय दिया और राज्य के गृह सचिव तथा DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से पेश होने के निर्देश दिए।

हालिया सुनवाई में राज्य के गृह सचिव और DGP वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश हुए। DGP ने कहा कि जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, कोर्ट इस बात से नाराज था कि मामले को जिस तरह से संभाला गया, विशेषकर दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने में हुई लंबी देरी को लेकर।

जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी में कहा,”हम देखेंगे कि जिम्मेदारी तय करने का काम किसे सौंपा जाना चाहिए। क्या राज्य पुलिस इसके लिए सक्षम है या इसे किसी अन्य एजेंसी को सौंपने की जरूरत है? हमने जो देखा है, उससे हमें नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन इस मामले से निपटने में सक्षम है।”

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जब DGP ने यह कहकर देरी को सही ठहराने की कोशिश की कि मौत की वजह संबंधी न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को नहीं भेजी गई थी, तो जस्टिस मेहता ने बताया कि वही रिपोर्ट हाईकोर्ट में राज्य के हलफनामे के साथ संलग्न थी।

जज ने कहा, “हम अवमानना की कार्रवाई शुरू करेंगे। हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।” न्यायिक जांच में यह पुष्टि हुई कि मृतक की मौत किसी कुंद हथियार से सिर पर लगी चोट के कारण हुई थी। DGP ने कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध रिपोर्ट को पढ़ने पर FIR दर्ज करने लायक कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है।

इस पर जस्टिस मेहता ने DGP से पूछा, “कुंद हथियार से सिर पर चोट लगने से मौत का क्या मतलब है? हमें बताइए। आप समझते हैं? आसान भाषा में?”

इसके बाद जज ने टिप्पणी की, “हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हमें यह दर्ज करना होगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं।”

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले की सीपत पुलिस ने श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी एक्ट के तहत 6 लीटर कच्ची महुआ शराब के मामले में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर भेज दिया गया। 21 जनवरी को उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

न्यायिक जांच में गंभीर चोट की पुष्टि

मृतक की मौत के बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बिलासपुर के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच कराई गई। 22 जुलाई 2024 की जांच रिपोर्ट में मृतक की मौत सिर में लगी गंभीर चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण होना बताया गया था। इसके बाद परिजनों ने जिम्मेदार पुलिस और जेल अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। मृतक की पत्नी और 8 व 10 वर्ष की दो नाबालिग बेटियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2024 को याचिका का निराकरण करते हुए परिवार को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

कोर्ट ने कहा कि राज्य, उन कर्मचारियों का नियोक्ता (Employer) होने के नाते, जिनकी लापरवाही के कारण मृतक की जान गई, मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार है। खास बात यह है कि 1 लाख रुपये का मुआवजा इस सोच के साथ दिया गया कि ऐसे मुआवजे का पुलिस या जेल अधिकारियों पर ऐसा प्रभाव पड़ना चाहिए, जिससे वे भविष्य में ऐसी हरकतें न करें, जिनकी वजह से किसी की जान जा सकती है। मामले को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया।

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