तुर्की के इस्तांबुल में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच हो रही शांति वार्ता नाटकीय ढंग से फेल हो गई। चार दिनों तक चली इस बातचीत के दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख मेजर जनरल शहाब असलम ने तालिबान नेताओं को खुलेआम अपशब्द कहे।
पाकिस्तान की इस बदतमीजी से शांति वार्ता के मध्यस्थ कतर और तुर्की के प्रतिनिधि भी हैरान रह गए। अफगानिस्तान ने इसे “बदतमीजी” करार देते हुए वार्ता रद्द कर दी और कड़ा रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को चेतावनी दी कि अगर अफगान सरजमीं पर हमला किया गया, तो इस्लामाबाद को निशाना बनाया जाएगा।
यह घटना दोनों देशों के बीच सीमा पर हाल की हिंसक झड़पों के बाद आई है, जहां दोनों ओर से दर्जनों सैनिक मारे गए थे।
सीजफायर के बाद थी शांति की उम्मीद
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव तब चरम पर पहुंचा जब अक्टूबर के मध्य में पाकिस्तानी सेना ने अफगानिस्तान के कंधार और काबुल में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के ठिकानों पर हवाई हमले किए।
पाकिस्तान का आरोप था कि तालिबान सरकार टीटीपी को पनाह दे रही है, जो पाकिस्तानी सेना पर हमले कर रहे हैं। पाक के इन हमलों में अफगानिस्तान के 12 नागरिक मारे गए, जबकि पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने “दर्जनों अफगान सैनिकों और आतंकवादियों” को मार गिराया। जवाब में अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान के 58 सैनिकों को मार गिराने का दावा किया।
इस हिंसा के बाद कतर ने 18-19 अक्टूबर को दोहा में पहली दौर की वार्ता आयोजित की, जहां कतर और तुर्की की मध्यस्थता से दोनों पक्षों ने अस्थायी सीजफायर पर सहमति जताई।
तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इसे “शांति की दिशा में सकारात्मक कदम” बताया था। इसके बाद दूसरा दौर तुर्की के इस्तांबुल में 25 अक्टूबर से शुरू हुआ, जहां पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आईएसआई के स्पेशल ऑपरेशंस डिवीजन प्रमुख मेजर जनरल शहाब असलम कर रहे थे, जबकि अफगान पक्ष का नेतृत्व उप-गृह मंत्री हाजी नजीब कर रहे थे।
वार्ता का मुख्य एजेंडा था:
- टीटीपी जैसे समूहों पर कार्रवाई और खुफिया जानकारी साझा करना।
- सीमा पर युद्धविराम को स्थायी बनाना।
- अमेरिकी ड्रोन हमलों और हवाई क्षेत्र के उल्लंघन पर गारंटी।
पाकिस्तानी ‘बदतमीजी’: गालियां और तीखी बहस
अफगान मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वार्ता के तीसरे दिन यानी 27 अक्टूबर को बहस तब गरम हो गई जब मेजर जनरल असलम ने तालिबान प्रतिनिधियों पर “टीटीपी को नियंत्रित न करने” का आरोप लगाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया।
असलम ने कहा, “तुम्हें सभी हिंसक समूहों को बुलाकर नियंत्रित करना चाहिए, वरना हम खुद कार्रवाई करेंगे।” इस पर अफगान पक्ष ने अमेरिकी ड्रोनों का मुद्दा उठाया।
अमेरिकी ड्रोन कथित तौर पर पाकिस्तान की मदद से अफगानिस्तान के अंदर घूम रहे हैं।
इस पर पाक के वार्ताकार असलम ने कतर के राजदूत से कहा, “तुम्हारे यहां अमेरिकी एयरबेस है, फिर तुम लोग ही ड्रोन क्यों नहीं रोकते?” कतर ने कहा कि उसका अमेरिका के साथ समझौता है इसलिए वह ऐसा नहीं कर सकता।
कतर दूत के जवाब पर असलम ने तंज कसते हुए कहा, “हमारे पास भी अमेरिका के साथ समझौता है।” पाकिस्तानी अधिकारी के इस कबूलनामे से साफ है कि अमेरिका अब फिर से पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और इसके लिए दोनों मुल्कों के बीच कोई खुफिया समझौता हुआ है।
इसके बाद बहस इतनी तीखी हो गई कि तुर्की और कतर के मध्यस्थों को बीच-बचाव करना पड़ा। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को वार्ता की पूरी जानकारी नहीं थी, उन्होंने अतार्किक बयान दिए, और कई बार अपमानजनक व्यवहार किया।
एक अफगान सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, “पाकिस्तानी पक्ष ने जिम्मेदारी लेने के बजाय दोषारोपण किया।” रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का “असहयोगी रवैया” मध्यस्थों को भी हैरान करने वाला था। तालिबान के रेडियो ब्रॉडकास्टर आरटीए ने इसे “पाकिस्तान की गैर-जिम्मेदाराना बदतमीजी” करार दिया।
अफगानिस्तान का आगबबूला रिएक्शन: चेतावनी और वार्ता रद्द
वार्ता के चौथे दिन (28 अक्टूबर) सुबह अफगान प्रतिनिधिमंडल ने बैठक छोड़ दी। तालिबान के रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर को खुली चेतावनी जारी की: “अगर अफगान सरजमीं पर एक भी हमला हुआ, तो हम इस्लामाबाद को तबाह कर देंगे।” तालिबान ने कहा कि वे “शांति के लिए प्रतिबद्ध थे, लेकिन पाकिस्तान ने सहयोग नहीं किया।”
पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने एक्स पर पोस्ट कर वार्ता को “व्यावहारिक समाधान लाने में विफल” बताया। उन्होंने तालिबान पर “दोषारोपण और बहाने बनाने” का आरोप लगाया, लेकिन कतर और तुर्की का धन्यवाद दिया। पाकिस्तान ने साथ ही भारत पर भी उंगली उठाई, दावा करते हुए कि “भारत तालिबान को भड़का रहा है।”