गाजा में यु्द्ध खत्म करने पर मुहर लगाने के लिए अमेरिका समेत कई देशों के प्रतिनिधि इस समय मिस्र के शर्म अल शेख में मौजूद हैं।
इसमें इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के शामिल होने की संभावना भी जताई गई थी, लेकिन उन्होंने इस सम्मेलन से कुछ समय पहले ही इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया।
एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप के अंतिम समय पर निमंत्रण देने पर नेतन्याहू इस सम्मलेन में शामिल होने वाले थे, लेकिन तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन की तरफ से डाले गए कूटनीतिक दबाव की वजह से उनका मिस्र आना संभव नहीं हो पाया।
कथित तौर एर्दोगान मिस्त्र के राष्ट्रपति सीसी को फोन करके कहा कि अगर नेतन्याहू वहां आते हैं, तो इजरायल इस डील से बाहर होगा।
एएफपी ने तुर्किए के एक राजदूत के हवाले से बताया कि एर्दोगन ने मिस्त्र में नेतन्याहू की उपस्थिति का विरोध किया और बाकी देशों के नेताओं से भी इस बारे में बात की।
नाम न छापने की शर्त पर राजदूत ने कहा, “राष्ट्रपति (रेसेप तैयप) एर्दोगन की पहल पर और तुर्की के राजनयिक प्रयासों से अन्य नेताओं से संपर्क साधा गया। इसके बाद उन नेताओं के समर्थन से की वजह से नेतन्याहू मिस्र में बैठक में शामिल नहीं हुए।”
तुर्किए की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गाजा पीस समिट में शामिल होने के लिए मिस्त्र जाने वाले एर्दोगन ने तब तक वहां उतरने से इनकार कर दिया, जब तक कि उन्हें आश्वासन नहीं मिल गया कि नेतन्याहू यहां नहीं आ रहे हैं। कथित तौर पर, जब तक उनके सामने इस बात की पुष्टि नहीं हो गई, तब तक उनका विमान आसमान में ही चक्कर लगाता रहा।
गौरतलब है कि इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने नेतन्याहू के मिस्त्र न जाने के पीछे यहूदी त्योहार सिमहत को वजह बताया है। यह त्योहार सोमवार को सूर्यास्त के समय शुरू हुआ था।
हालांकि राजनयिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अन्य देशों के बढ़ते विरोध के बाद ही नेतन्याहू ने कार्यक्रम से पीछे हटने का फैसला लिया।
आपको बता दें, गाजा में कथित युद्ध अपराधों के चलते नेतन्याहू के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट की तरफ से गिरफ्तारी वारंट निकाला गया है।
हालांकि, मिस्त्र इंटरनेशल कोर्ट समझौते का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, लेकिन इसके बाद वहां मौजूद दूसरे अरब नेता इस पर आपत्ति जता सकते थे।
दूसरी ओर, नेतन्याहू की उपस्थिति और वहां पर फिर अरब नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें वायरल होने की स्थिति में घरेलू स्तर पर उनकी राजनीति भी प्रभावित हो सकती थी। एर्दोगान शुरुआत से ही इजरायल के कटु आलोचक रहे हैं।