नंदिनी मानिकपुरी (संपदक-छत्तीसगढ़):
रायपुर, 12 अक्टूबर 2025।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने राज्य में कार्यरत जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू/एसीबी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एजेंसी ने अदालत की प्रक्रियाओं को दरकिनार कर झूठे साक्ष्य गढ़े हैं, जिससे न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न लग गया है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एवं अन्य वरिष्ठ नेताओं ने राजीव भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि “ईओडब्ल्यू और एसीबी न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियां उड़ा रहे हैं, और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं।”
❖ कांग्रेस के प्रमुख आरोप
- ईओडब्ल्यू/एसीबी ने अभियुक्तों के विरुद्ध झूठे साक्ष्य तैयार किए हैं।
- फोरेंसिक जांच से यह साबित हुआ कि संबंधित दस्तावेजों में दो अलग-अलग फॉन्ट का प्रयोग किया गया है।
- जांच एजेंसी द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष पेन ड्राइव से तैयार बयान प्रस्तुत किया गया, जो न्यायिक प्रक्रिया का घोर उल्लंघन है।
- कांग्रेस ने पूछा कि “क्या इस पूरी प्रक्रिया में अदालतों की भी मौन सहमति है?”
❖ धारा 164 (अब BNSS की धारा 183) के तहत गंभीर अनियमितताएं
कांग्रेस नेताओं ने बताया कि अभियुक्तों के कलमबद्ध बयान (धारा 164 के अंतर्गत) गोपनीय और सीलबंद रखे जाते हैं, जिन्हें केवल अदालत में सुनवाई के दौरान ही खोला जा सकता है। लेकिन कोयला घोटाले से जुड़े मामलों में ईओडब्ल्यू/एसीबी ने पहले से टाइप किया गया बयान अदालत में दाखिल कर दिया, जिसे अभियुक्त का मौखिक बयान बताया गया।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि एजेंसी ने न्यायालय को गुमराह करने का आपराधिक कृत्य किया है। फॉन्ट और प्रारूप से स्पष्ट है कि यह दस्तावेज अदालत में नहीं, बल्कि एजेंसी के दफ्तर में तैयार किया गया था।
❖ मामला कैसे उजागर हुआ
यह पूरा प्रकरण तब सामने आया जब कोयला घोटाले (अपराध क्रमांक 02/2024, 03/2024) में अभियुक्त सूर्यकांत तिवारी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान, ईओडब्ल्यू/एसीबी ने सुप्रीम कोर्ट में निखिल चंद्राकर का कथित बयान प्रस्तुत किया।
जांच में यह सामने आया कि:
- जो बयान सीलबंद होना चाहिए था, वह खुला हुआ कोर्ट में पेश किया गया।
- बयान की भाषा और संरचना न्यायालयीन प्रारूप से अलग थी।
- उसमें उपयोग हुआ फॉन्ट ‘ऊबन्तू’ नहीं, बल्कि एजेंसी के कंप्यूटर का था।
❖ शिकायतें और जांच की मांग
वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं अधिवक्ता गिरीश चंद्र देवांगन ने 10 अक्टूबर 2025 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, रायपुर के समक्ष परिवाद दायर किया है।
इससे पूर्व 12 सितंबर को उन्होंने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (सतर्कता) को भी शिकायत सौंपी थी।
फोरेंसिक विशेषज्ञ इमरान खान की जांच रिपोर्ट में फॉन्ट में अंतर और फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई है।
देवांगन ने अपनी शिकायत में कहा है कि यह एक संज्ञेय अपराध है, जिसमें निदेशक अमरेश मिश्रा, अधिकारी राहुल शर्मा और चंद्रेश ठाकुर की भूमिका संदिग्ध है। उन्होंने संबंधित अदालतों के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने की भी मांग की है।
❖ “न्यायपालिका और जांच एजेंसी की मिलीभगत लोकतंत्र के लिए खतरा”
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि 16–17 जुलाई और 30 सितंबर को रायपुर की दो अदालतों में भी इसी प्रकार पेन ड्राइव से बयान दर्ज किए जाने की घटनाएं सामने आईं।
कई अधिवक्ताओं ने इसकी लिखित शिकायत भी दर्ज कराई है।
कांग्रेस ने कहा कि अगर यह सिलसिला जारी रहा तो यह “न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला” होगा।
❖ कांग्रेस का आरोप — “संविधान के तीनों स्तंभों में संतुलन खतरे में”
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि भाजपा शासन में कार्यपालिका और जांच एजेंसियां पहले ही राजनीतिक प्रभाव में काम कर रही हैं। अब अगर न्यायपालिका भी दबाव में आएगी, तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
उन्होंने कहा, “देश के इतिहास में पहली बार किसी जांच एजेंसी ने अदालत को धोखा देकर अपने कार्यालय से तैयार बयान को अभियुक्त का बयान बताया है। यह आपराधिक षड्यंत्र है।”
❖ कांग्रेस की मांगें
- इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो और न्यायालय सभी ऐसे मामलों के बयान मंगाकर फोरेंसिक जांच कराए।
- ईओडब्ल्यू/एसीबी के निदेशक अमरेश मिश्रा, राहुल शर्मा और चंद्रेश ठाकुर पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।
- जांच पूरी होने तक राज्य सरकार इन अधिकारियों को पद से हटाए, ताकि निष्पक्ष जांच संभव हो।
- इस मामले में ऐसी कानूनी मिसाल बने जिससे भविष्य में कोई एजेंसी या अदालत न्यायिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ न कर सके।
- उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस मामले का स्वतः संज्ञान लेकर कठोर कार्रवाई करें।
❖ उपस्थित नेता
पत्रकार वार्ता में वरिष्ठ कांग्रेस नेता सत्यनारायण शर्मा, पूर्व मंत्री मो. अकबर, डॉ. शिवकुमार डहरिया, पूर्व सांसद छाया वर्मा, महामंत्री मलकीत सिंह गैदू, वरिष्ठ नेता राजेन्द्र तिवारी, गिरीश देवांगन, संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला, पूर्व विधायक विकास उपाध्याय, महामंत्री सकलेन कामदार, वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर, सुरेन्द्र वर्मा, घनश्याम राजू तिवारी, डॉ. अजय साहू, प्रवक्ता नितिन भंसाली एवं अजय गंगवानी उपस्थित थे।
कांग्रेस का निष्कर्ष:
“अगर जांच एजेंसियां अदालतों की मिलीभगत से झूठे साक्ष्य गढ़ने लगें, तो यह न केवल न्यायपालिका के लिए, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर खतरा है।”