दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक दृष्टि पर एक नया साया मंडरा रहा है। दरअसल जो पाकिस्तान लंबे समय से चीन की छत्रछाया में रहा, वह अब अमेरिका और तुर्की के साथ अपनी साझेदारियों को नई गति दे रहा है।
यह बदलाव न केवल इस्लामाबाद की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि भारत की सुरक्षा, व्यापारिक हितों और क्षेत्रीय प्रभाव को सीधे चुनौती दे रहा है।
आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के बीच पाकिस्तान अब अमेरिका और तुर्की को रणनीतिक रूप से अहम सौदे पेश कर रहा है।
इनमें सबसे बड़ा कदम है- अरब सागर के किनारे स्थित पसनी बंदरगाह को अमेरिका के लिए खोलने का प्रस्ताव, जो चीन के ग्वादर बंदरगाह से मात्र 100 किलोमीटर दूर है।
पासनी बंदरगाह: अमेरिका के लिए रणनीतिक प्रस्ताव
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान को अमेरिका का प्रमुख सहयोगी माना जाता था, लेकिन 9/11 के बाद आतंकवाद विरोधी अभियान में पाकिस्तान की दोहरी नीति ने इस रिश्ते को ठंडा कर दिया। 2025 में, हालांकि, वाशिंगटन ने इस्लामाबाद की ओर फिर से रुख किया है।
इसका प्रमुख कारण? क्षेत्रीय स्थिरता, खनिज संसाधनों तक पहुंच और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका को बलूचिस्तान के पासनी में 1.2 अरब डॉलर से अधिक की लागत वाले एक “नागरिक” बंदरगाह के निर्माण और संचालन की पेशकश की है।
यह बंदरगाह चीन के बनाए ग्वादर बंदरगाह से मात्र 100 किलोमीटर और भारत-ईरान के संयुक्त रूप से विकसित चाबहार बंदरगाह के करीब है।
सितंबर में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बैठक के बाद यह प्रस्ताव सामने आया।
इस प्रस्ताव को आकर्षक बनाने के लिए पाकिस्तान ने अपनी खनिज संपदा, विशेष रूप से ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ तक पहुंच देने का भी संकेत दिया है, जो रक्षा और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि इस बंदरगाह पर कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं होगा, लेकिन पसनी की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बना देती है।
पाकिस्तान ने अमेरिका को सीमित ड्रोन सुविधाएं प्रदान करने की भी पेशकश की है, जो 2000 के दशक की शुरुआत में शम्सी हवाई अड्डे से अमेरिकी ड्रोन संचालन की याद दिलाता है। 2011 में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद जनता के आक्रोश के कारण यह सहयोग बंद हो गया था।
लेकिन बढ़ते उग्रवाद और आर्थिक संकट के बीच, इस्लामाबाद अब इस तरह के सहयोग को दोबारा खड़ा करने के लिए तैयार है। इस कदम से पाकिस्तान को निवेश और कूटनीतिक समर्थन की उम्मीद है।
अमेरिका के लिए यह प्रस्ताव आकर्षक है, क्योंकि पासनी में उपस्थिति अफगानिस्तान और ईरान पर निगरानी की क्षमता को बहाल कर सकती है, जहां से 2021 में अमेरिकी वापसी के बाद निगरानी में कमी आई थी।
तुर्की को 1000 एकड़ जमीन का तोहफा
पाकिस्तान का झुकाव केवल वाशिंगटन की ओर ही नहीं है। तुर्की और पाकिस्तान के बीच संबंध बहुत पुराने हैं, लेकिन 2025 में यह गठबंधन रक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के स्तर पर अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुआ है।
इसी साल तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान 24 समझौते साइन हुए, जिनमें अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (यूएवी) और रडार सिस्टम्स के संयुक्त उत्पादन शामिल हैं।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन को कराची इंडस्ट्रियल पार्क में 1000 एकड़ जमीन मुफ्त में देने की घोषणा की।
यहां एक ‘एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन’ (EPZ) स्थापित किया जाएगा, जिसमें कर छूट, आसान लॉजिस्टिक्स और मध्य एशिया व खाड़ी देशों तक सीधी शिपिंग की सुविधा मिलेगी।
यह कदम सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक संकेत भी था। तुर्की ने उसी समय भारत के साथ हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था।
कराची EPZ को विश्लेषक इस समर्थन के बदले ‘इनाम’ और दीर्घकालिक औद्योगिक-मिलिट्री सहयोग की दिशा में कदम मान रहे हैं।
त्रिकोणीय कूटनीतिक शतरंज
अब पाकिस्तान की नई कूटनीति तीन दिशाओं में फैल रही है-
सुरक्षा और खुफिया सहयोग – अमेरिका के साथ पसनी पोर्ट और ड्रोन एक्सेस के जरिए।
औद्योगिक और व्यापारिक सहयोग – तुर्की के साथ कराची EPZ के माध्यम से।
बुनियादी ढांचा और संपर्कता – चीन के साथ ग्वादर और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए।
लेकिन इन तीनों ध्रुवों के बीच संतुलन साधना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा। चीन ग्वादर और अन्य परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश कर चुका है।
यदि अमेरिका को पासनी में उपस्थिति मिलती है, तो बीजिंग इसे अपनी सामरिक पहुंच के लिए चुनौती मानेगा। जवाब में चीन अपनी नौसैनिक और लॉजिस्टिक उपस्थिति बढ़ा सकता है, जिससे अरब सागर में तनाव और बढ़ेगा।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए यह घटनाक्रम सीधे तौर पर रणनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है। पासनी बंदरगाह भारत के चाबहार टर्मिनल से महज 300 किलोमीटर की दूरी पर है।
यदि अमेरिका को वहां परिचालन पहुंच मिलती है, तो तीन रणनीतिक नोड्स- चाबहार (भारत-ईरान), ग्वादर (चीन-पाकिस्तान), और पासनी (अमेरिका-पाकिस्तान) एक त्रिकोण बना देंगे, जिसके बीच भारत फंस सकता है।
अमेरिका-पाकिस्तान ड्रोन सहयोग भारत के पश्चिमी सीमांत पर नई खुफिया क्षमताएं प्रदान कर सकता है। वहीं, कराची में तुर्की की बढ़ती आर्थिक उपस्थिति भारत-विरोधी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अंकारा-इस्लामाबाद गठजोड़ को और मजबूत कर सकती है।
भूगोल के बदले कैश
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की यह नीति साहसिक जरूर है, लेकिन मूलतः ‘भूगोल को बेचकर अर्थव्यवस्था बचाने’ की कोशिश है। IMF की कड़ी शर्तों, बढ़ती बेरोजगारी और आंतरिक अस्थिरता के बीच इस्लामाबाद विदेशी साझेदारियों के जरिये नकदी और वैधता जुटाना चाहता है।
लेकिन विरोधाभास साफ है- वह एक ओर ग्वादर में चीन के निवेश पर निर्भर है, तो दूसरी ओर पास ही अमेरिका को निवेश का प्रस्ताव दे रहा है। इसी तरह, वह तुर्की को सैन्य सहयोग की पेशकश करते हुए खाड़ी देशों की नाराजगी भी मोल ले सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक सबक
भारत के लिए यह स्थिति नए सिरे से रणनीतिक तैयारी की मांग करती है। उसे पश्चिमी तट पर समुद्री निगरानी को मजबूत करना होगा, ईरान और खाड़ी देशों के साथ साझेदारी गहरी करनी होगी, और अपने रक्षा-खुफिया नेटवर्क को आत्मनिर्भर बनाना होगा।
पाकिस्तान की यह “मल्टी-वेक्टर” कूटनीति उसे फिलहाल कुछ राहत दे सकती है, लेकिन दीर्घकालिक भू-राजनीतिक खेल में जीत अंततः उसी की होती है जिसके पास दृष्टि और संतुलन हो- केवल भूगोल नहीं।