गोडसे ने उस दिन क्या कहा? गांधी के हत्यारे की कोर्ट में स्पीच सुन जज भी हुए भावुक…

नाथूराम गोडसे, देश के राजनीतिक इतिहास में इस एक नाम की चर्चा खूब होती है, महात्मा गांधी की जयंती और पुण्यतिथि पर तो खासकर। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि गांधी जी की हत्या के इतने सालों के बाद भी उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को लेकर समाज में दो विचार हैं।

एक जो उसे दोषी मानता है, एक जो उसके किए पर उसे शाबाशी देता है। हर साल की तरह 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे को ट्रेंड में लाने का रिवाज भी है।

महात्मा गांधी के साथ नीचे आपको नाथूराम गोडसे ट्रेंडिंग में लिखा दिख जाएगा। खैर, आज हम हम गांधी हत्याकांड से जुड़ा वो पन्ना खोलेंगे जिसके दम पर गोडसे के समर्थक दंभ भरते हैं।

वो पन्ना नाथूराम गोडे की वो स्पीच है जो उसने दोषी सिद्ध होने के बाद कोर्ट में दी थी। कहते हैं कि उस वक्त गोडसे की स्पीच वहां बैठे एक जज के आंखों में भी आंसू ला दिए थे।

कहा था कि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता, तो निस्संदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते। तो चलिए आपको भी उस स्पीच की एक-एक बात बता देते हैं।

नाथूराम गोडसे की ये स्पीच आपको यूट्यूब या गूगल सर्च पर आसानी से मिल जाएगी। ‘मैंने गांधी को क्यूं मारा’ किताब में भी इसका जिक्र है। तो चलिए शुरू करते हैं।

नाथूराम गोडसे ने उस दिन कोर्ट में कहा कि मेरा नेताओं से मतभेद था तथा अब तक है। यह मेरे 28 फरवरी 1935 के सावरकर के नाम पत्र से भली-भांति विदित होता है।

आज भी मेरे वही विचार हैं। गांधी जी से मेरी शत्रुता नहीं थी। लोग कहते हैं कि पाकिस्तान योजना में उनका मन शुद्ध था। मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरे मन में देश प्रेम के अतिरिक्त कुछ ना था।

मुझे इस कारण हाथ उठाना पड़ा कि पाकिस्तान बनने पर जो भयंकर घटनाएं हुई उनके उत्तरदाई केवल गांधी जी थे। मुझे यह पता था कि हत्या के बाद लोगों के विचार मेरे विषय में बदल जाएंगे।

समाज में मेरा जितना आदर है वह नष्ट हो जाएगा। मैं जानता था कि समाचार पत्र बुरी तरह मेरी निंदा करेंगे किंतु मैं नहीं जानता था कि अखबार इतने पतित हो जाएंगे कि सत्य का गला घोट देंगे।

समाचार पत्रों ने कभी निष्पक्षता से नहीं लिखा। यदि वे देश के हित का अधिक ध्यान रखते और एक मनुष्य की व्यक्तिगत इच्छाओं को कम ध्यान देते तो देश के नेता पाकिस्तान स्वीकार न करते।

समाचार पत्रों की यह नीति थी कि लीडरों की गलतियों को प्रकट ना होने दिया जाए। देश का विभाजन इससे सरल हो गया। ऐसे भ्रष्ट समाचार पत्रों के डर से मैंने अपने निश्चय की दृढ़ता को विचलित नहीं होने दिया।

गोडसे आगे कहते हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि यदि पाकिस्तान ना बनता, तो आजादी न मिलती। मैं इस विचार को ठीक नहीं मानता। लीडरों ने अपने पाप को छिपाने के लिए यह बहाना बनाया है।

गांधीवादी कहते हैं कि उन्होंने अपनी शक्ति से स्वराज्य पाया। यदि उन्होंने अपनी शक्ति से स्वराज्य लिया है तो उन्होंने हारे हुए अंग्रेजों को पाकिस्तान की शर्त क्यों रखने दी? और शक्ति से क्यों ना रोका?

मेरे विचार से महात्मा और उनके अनुयायियों की एक ही पॉलिसी रही और वो यह कि पहले यवनों की मांग पर विरोध दर्शाना फिर हिचक दिखाना और अंत में आत्मसमर्पण कर देना। इसी प्रकारपाकिस्तान की रूपरेखा स्वीकार कर ली गई।

छल से स्वीकार किया पाकिस्तान…

नाथूराम ने कोर्ट में कहा कि 15 अगस्त 1947 को छल पूर्वक पाकिस्तान स्वीकार कर लिया गया। पंजाब, बंगाल, सीमा प्रांत और सिंध के हिंदुओं का कोई विचार नहीं किया गया।

देश के टुकड़े करके एक मजहबी धर्मनिष्ठित मुस्लिम राज्य बना दिया गया। मुसलमानों को अपने अराष्ट्रीय कार्यों का फल पाकिस्तान के रूप में मिल गया।

गांधीवादी नेताओं ने उन लोगों को देशद्रोही सांप्रदायिक कहकर पुकारा जिन्होंने पाकिस्तान का विरोध किया था और पाकिस्तान स्वयं स्वीकार करके जिन्ना की सब बात मान ली। इस दुर्घटना से मेरे मन की शांति भंग हो गई।

पाकिस्तान बनाने के बाद कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करती तो मेरा क्रोध शांत हो जाता। मैं नहीं देख सकता था कि जनता को धोखा दिया जाए।

करोड़ों हिंदुओं को मुसलमानों की दया पर छोड़कर गांधीवादी कहते रहे कि हिंदुओं को पाकिस्तान से नहीं आना चाहिए और वहीं रहना चाहिए। इस प्रकार हिंदू मुसलमानों के चंगुल में फंस गए और विकट विपत्तियों के शिकार हुए।

गोडसे ने भरी कोर्ट में अपने बचाव में आगे कहा कि जब मुझे इन घटनाओं की याद आती है तो मैं कांप उठता हूं। प्रतिदिन सहस्त्रों हिंदुओं का संहार होता था। 15,000 सिखों को गोलियों से बून दिया गया।

हिंदू स्त्रियों को नग्न करके जुलूस निकाले गए। उनको पशुओं की भांति बेचा गया। लाखों हिंदुओं को धर्म बचाकर भागना पड़ा। 40 मील लंबा हिंदू निराश्रितों का जत्था हिंदुस्तान की ओर आ रहा था।

हिंदुस्तान शासन इस भयानक कृत्य का कैसे भयानक निवारण करता था।

…तो इतने अत्याचार न होते

गांधी के हत्यारे ने आगे कहा कि भारत सरकार पाकिस्तान से अत्याचार रोकने के लिए अनुरोध करती या धमकी देती कि यदि पाकिस्तान में अत्याचार बंद नहीं हुआ तो भारत में भी मुसलमानों की बुरी दशा होगी तो इतने अत्याचार ना होते।

भारत सरकार गांधी जी के इशारों पर चलती थी और उसकी नीति कुछ और ही थी। यदि पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा के लिए समाचार पत्र कुछ लिख देते थे तो यह अर्थ लिया जाता था कि वे हिंदू मुसलमान में मतभेद फैलाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

ऐसे कार्यों को अपराध माना जाने लगा और प्रेस इमरजेंसी एक्ट की धाराएं लागू करके एक के बाद एक दूसरी जमानत मांगी जाने लगी। मुझे भी अनेक नोटिस मिले और 1000 रुपये सुरक्षित निधि तक मांगी गई।

नाथूराम गोडसे ने आगे कहा कि श्री मोरारजी देसाई के न्यायालय बयान के अनुसार ऐसी 900 घटनाएं हुई। इतना ही नहीं जब प्रेस प्रतिनिधि मंडल मोरारजी से मिलने गया तो उन्होंने उनकी एक न सुनी।

इस प्रकार मुझे आशा न रही कि गांधीवादी कांग्रेस सरकार पर शांतिमय ढंग से दबाव डाला जा सकता है। जब इस प्रकार की घटनाएं हो रही थी तब पाकिस्तान या मुसलमानों के विरुद्ध गांधी जी ने एक भी शब्द नहीं कहा।

हिंदू जाति और संस्कृति को मिटाने के लिए मुसलमानों ने जो अत्याचार किए उनका मूल कारण गांधी है। यदि भारत की राजनीति को भली-भांति संभाला जाता तो ऐसा हिंदू संहार कभी ना होता जैसा अब हुआ और जिसका उदाहरण इतिहास में कहीं नहीं मिलता।

गांधी के अनशन के तरीके पर दिक्कत

गोडसे ने अपने कोर्ट में दिए भाषण में कहा कि बसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुसलमानों से संबंध रखने वाली समस्याओं में गांधी जी ने कभी जनता के विचारों की ओर ध्यान नहीं दिया।

गांधी जी की अहिंसा की आड़ में इतना रक्तपात हो चुका था कि जनता पाकिस्तान के पक्ष में किसी भी विचार का स्वागत करने के लिए तैयार ना थी।

स्पष्ट था कि जब तक पाकिस्तान में धर्मांध मुसलमान राज्य है तब तक भारत में शांति नहीं हो सकती। फिर भी गांधी जी इस प्रकार का प्रचार कर रहे थे और इस तरह के विचार पाकिस्तान के पक्ष में फैला रहे थे जैसा कर सकने में कोई कट्टर लीग का नेता भी सफल ना हो पाता।

इन्हीं दिनों में उन्होंने आमरण अनशन की घोषणा करते हुए जो शर्तें रखी वे सब भी केवल हिंदुओं के विरुद्ध और मुसलमानों के पक्ष में थी। गांधी जी के अनशन की जो शर्तें थी, उनमें पहली यह थी कि दिल्ली की मस्जिदों में रह रहे हिंदू शरणार्थियों को बाहर निकाला जाए और मस्जिदें मुसलमानों को सौंप दी जाए।

गांधी जी ने अपनी शर्त सरकार और अन्य नेताओं को अनशन की धमकी देकर स्वीकार कराई। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन मैं दिल्ली में था। मैंने देखा कि किस प्रकार गांधी जी की जिद को पूरा किया गया।

गोडसे ने आगे कहा कि वे शीत के दिन थे। गांधी जी ने अनशन खोला। उस दिन वर्षा हो रही थी। ऐसी असाधारण सर्दी और वर्षा में अच्छे स्थानों पर रहने वाले लोग भी कांप रहे थे।

उस समय निराश्रित शरणार्थियों के कुटुंब के कुटुंब मस्जिदों से सर्दी के मारे कांपते हुए निकाले गए। उनकी रक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया।

कुछ शरणार्थी जो कुटुंब और स्त्रियों सहित बिरला हाउस गए और उन्होंने नारे लगाए। गांधी जी हमें स्थान दो। उस भव्य भवन में रहने वाले गांधी तक उन निराश्रितों की आवाज नहीं पहुंच सकी।

मैंने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा जिसे देखकर कठोर से कठोर व्यक्ति का हृदय भी पिघल जाता। मेरे मस्तिष्क में इससे अनेक विचार आने लगे।

मैंने सोचा कि क्या शरणार्थियों ने प्रसन्नता से इन मस्जिदों में डेरे डाले थे? नहीं। नहीं गांधी को भी उन स्थितियों का पूरा पता था जिनसे बाध्य होकर उन्हें अपने घर छोड़कर इन मस्जिदों की शरण लेनी पड़ी।

नाथूराम ने आगे बताया कि पाकिस्तान में एक भी मंदिर या गुरुद्वारा सुरक्षित नहीं रहा। शरणार्थियों ने अपनी आंखों से देखा था कि किस प्रकार मुसलमानों ने केवल हिंदू मंदिरों और गुरुद्वारों को अपवित्र किया।

जो हिंदू शरणार्थी दिल्ली शरण लेने के लिए आए थे, उन्हें यहां कोई स्थान नहीं मिला। इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यदि उन लोगों ने पेड़ों के नीचे और गली कूचों में न पड़े रहकर पंजाब में बीती हुई दुर्घटनाओं को स्मरण करके दिल्ली

की व्यर्थ पड़ी मस्जिदों में शरण ली। मेरे विचार में इस प्रकार मस्जिदें मानवता की भलाई के लिए काम आ रही थी। गांधी जी ने यह निश्चय किया कि मस्जिदों को खाली कराया जाए।

वहां उनके रहने का दूसरा प्रबंधक क्यों नहीं कराया? उन्होंने पाकिस्तान के मंदिर हिंदुओं को सौंपने की मांग क्यों नहीं की? जिससे पता चलता कि गांधी वस्तुतः अहिंसा के पुजारी हैं।

हिंदू मुस्लिम एकता के इच्छुक है और उनमें निष्पक्ष आत्मशक्ति है। गांधी ने पूरी चालाकी की और अपने अनशन को खोलने के लिए पाकिस्तान के लिए एक भी शर्त न रखी।

यदि वे रखते तो संसार देखता कि गांधी जी अनशन करते हुए स्वर्ग सिधार जाते और पाकिस्तान के एक भी मुसलमान को ले मात्र दुख न होता।

उन्होंने अपने अनुभव से देख लिया था कि उनके व्रत का जिना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और लीग उनकी आत्मशक्ति की परवाह नहीं करती।

अंत में यह कहना अनुचित ना होगा कि गांधी के फूल यानी अस्थि भारत और विदेशों की बहुत सी नदियों में बहाए गए। परंतु यह अस्थि पाकिस्तान की सिंधु नदी में नहीं बहाई जा सकी। इस संबंध में पाकिस्तान में भारत के राजदूत श्रीयत श्री प्रकाश जी का प्रयत्न निष्फल रहा।

अब 55 करोड़ रुपयों की बात लीजिए। उप प्रधानमंत्री का निवेदन देखिए। गांधी जी ने स्वयं कहा है कि किसी गवर्नमेंट से उसका निर्णय बदलवाना कठिन हो जाता है, लेकिन भारत सरकार ने गांधी जी के अनशन के कारण पाकिस्तान को 55 करोड़ न देने का अपना निर्णय बदल दिया।

गांधी जी का 21 जनवरी 1948 का प्रार्थना प्रवचन देखिए। सरकार ने 55 करोड़ न देने का निर्णय जनता के प्रतिनिधि होने के नाते किया था, लेकिनगांधी जी के अनशन ने इस निर्णय को बदल दिया। तब मुझे यह ज्ञात हुआ कि गांधी जी की पाकिस्तान परस्ती के आगे जनता के मत का कोई महत्व नहीं है।

अपने प्रतिवृत्त के पहले खंड के पृष्ठ 143 पर न्यायमूर्ति कपूर ने उस समय वृत्त पत्रों में छपी प्रक्रिया का एक उदाहरण दिया है।

गोडसे ने आगे कहा कि मुसलमानों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया, इसीलिए पाकिस्तान बना। जिन्होंने पाकिस्तान का पक्ष लिया उनको पांचवें स्तंभ कहा गया है। उनकी निंदा की गई है। परंतु मेरी दृष्टि में गांधी जी ने पाकिस्तान का पक्ष सबसे अधिक लिया और कोई शक्ति उनको रोक नहीं सकी।

इस स्थिति में हिंदुओं को मुसलमानों के अत्याचारों से बचाने का एक ही उपाय था कि गांधी का अंत कर दिया जाए। गांधी जी राष्ट्रपिता के नाम से पुकारे जाते हैं। जो अत्यंत सम्मान का पद है पर वे पिता का कर्तव्य पालन करने में असफल रहे।

उन्होंने तो बड़ी निर्दयता से राष्ट्र के दो टुकड़े कर दिए। यदि वे सच्ची आत्मा से पाकिस्तान का विरोध करते तो लीग कभी भी इतनी सुदृढ़ता से यह मांग ना रख पाती और अंग्रेज पूर्ण प्रयत्न करके भी इसे न बना पाते।

देश की जनता पाकिस्तान बनाने की घोर विरोधी थी। पर गांधी जी ने जनता को धोखा दिया और मुसलमानों के पाकिस्तान का पिता सिद्ध किया है।

इसलिए मैंने भारत माता का एक पुत्र होने के नाते अपना कर्तव्य समझा कि ऐसे व्यक्ति का अंत कर दिया जाए जिसको कहा तो जा रहा है राष्ट्रपिता किंतु जिसने मातृभूमि का विभाजन करने में सर्वाधिक हाथ बटाया है।

गांधी के लिए इस बात को लेकर सम्मान

नाथूराम गोडसे ने आगे कहा कि मैंने दूसरे भारतीय देशभक्तों और नेताओं के भी चरित्र पढ़े हैं। जिन्होंने गांधी जी से अधिक बलिदान किए हैं। कुछ भी हो गांधी जी ने देश की जो सेवा की है उसके लिए मैं उनका आदर करता हूं। उन पर गोली चलाने के पूर्व मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था।

किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को नहीं है। गांधी जी ने देश को छलकर देश के टुकड़े किए क्योंकि ऐसा न्यायालय या कानून नहीं था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता। इसीलिए मैंने गांधी को गोली मारी। उनको दंड देने का केवल यही एक तरीका रह गया था।

यदि मैं यह ना करता तो मेरे लिए अच्छा ही होता परंतु स्थिति बहुत खराब हो गई थी और मेरे हृदय में इतना अधिक शोभ था कि मैंने सोचा कि गांधी जी को स्वाभाविक मृत्यु से नहीं मरने देना चाहिए।

संसार को पता लग जाए कि इस व्यक्ति ने अन्याय पूर्वक राष्ट्र के साथ छल करके भयानक रूप से देश के एक संप्रदाय का जो पक्ष लिया है, उसका दंड भोगना पड़ा। मैंने इस समस्या का अंत इसी प्रकार करना चाहा क्योंकि इसी से लाखों निर्दोष हिंदुओं का जीवन बच सकता था।

गोडसे ने आगे कहा कि आप मेरी इस भावना को जिस प्रकार देखना चाहे देखें और इस भावना के परिणाम स्वरूप मेरे किए हुए इस कार्य को देखकर जो दंड उचित समझे दें। इस विषय में कुछ कहने की मेरी इच्छा नहीं है।

मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करें। इस अभियोग में बहुत से मनुष्यों को मेरे साथ इस अपराध में ले लिया है।

उन पर आरोप है कि उन्होंने षड्यंत्र रचा। इस विषय में मैं पहले ही कह चुका हूं कि इस कार्य में मेरा कोई साथी नहीं था। स्वयं मैं और केवल मैं ही इसका उत्तरदाई हूं। यदि दूसरे लोग इसी दोष के लिए नहीं खड़े किए जाते तो मैं अपने लिए बचाव भी न करता।

मैंने यह लंबा वक्तव्य इसलिए नहीं दिया है कि लोग मेरे कार्य को सराह बल्कि इसलिए दिया है कि लोग मेरे विचारों को भलीभांति जान जाए और किसी के मस्तिष्क में मेरे विषय में कोई भ्रांत धारणा ना रहे।

भगवान करें हमारा देश फिर अखंड हो और जनता उन विचारों का त्याग करें जो अत्याचारी के आगे झुकने की प्रेरणा देते हैं। भगवान से यही मेरी अंतिम प्रार्थना है। मेरा वक्तव्य अब समाप्त हो चुका है।

आपने इसे ध्यान से सुना और सुविधाएं दी। उसके लिए मैं कृतज्ञ हूं।

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