Anant Chaturdashi Vrat Katha: कैसे अनंत चतुर्दशी के व्रत से बदल गई ऋषि कौंडिन्य की किस्मत? जानें पूरी कथा यहां…

अनंत चतुर्दशी का व्रत आज है। हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी व्रत का बहुत अधिक महत्व है। अनंत चतुर्दशी के दिन शयन कर रहे भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है।

मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने से जो पुण्य मिलता है वो कभी भी समाप्त नहीं होता है। इस व्रत से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वन में भटक रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने की सलाह दी थी।

इस दिन भक्त अपने हाथ में 14 गांठों वाला ‘अनंत सूत्र’ धारण करते हैं। अनंत चतुर्दशी पर महिलाएं अपने बाएं हाथ में अनंत धागा बांधती हैं, जबकि पुरुष अपने दाएं हाथ में बांधते हैं।

यह धागा हल्दी या केसर में रंगा हुआ सूती या रेशम का होता है। अनंत चतुर्दशी के दिन व्रत कथा का पाठ करना या सुनना भी बेहद शुभ होता है। आइए, आगे पढ़ें अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा….

अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा….

बहुत समय पहले एक ब्राह्मण था जिसका नाम था सुमन्त। वह अत्यंत दयालु था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। दोनों बड़े प्रेम और सादगी से जीवन व्यतीत करते थे। उनके घर लक्ष्मी का वास था।

सुमन्त और दीक्षा की एक अत्यंत सुंदर और संस्कारी पुत्री थी, जिसका नाम सुशीला था। कुछ समय बाद सुमन्त की पत्नी का देहांत हो गया। तब उसने दूसरी शादी कर ली। सुमन्त की दूसरी पत्नी का नाम कर्कशा था।

वह सुशीला को अपनी सौतन की संतान समझकर अक्सर ताने देती और उसे कष्ट पहुंचाती थी। ज

ब सुशीला विवाह योग्य हो गई तो सुमन्त ने एक योग्य वर की तलाश की। उसे ऋषि कौण्डिन्य नामक ब्राह्मण युवक मिला, जो विद्वान, तपस्वी और चरित्रवान था।

सुमन्त ने अपनी पुत्री का विवाह ऋषि कौंडिन्य से कर दिया। विदाई के समय सुमन्त ने ऋषि कौण्डिन्य को ईंट और पत्थरों के टुकड़े बांध के दे दिए।

ऋषि कौंडिन्य इस अपमानजनक व्यवहार से भीतर-ही-भीतर आहत हुए। फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा और अपनी पत्नी सुशीला को लेकर वहां से निकल पड़े।

रास्ते में संध्या हो चुकी थी। वे लोग नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने देखा- सुंदर-सुंदर वस्त्र धारण किए हुईं महिलाएं, हाथों में कलश, फलों-फूलों, दीपक और चौदह गांठ वाला सूत लिए, अत्यंत श्रद्धा से किसी देवता का पूजन कर रही थीं।

यह दृश्य देखकर सुशीला को आश्चर्य हुआ। उसने जब महिलाओं से पूछा तो महिलाओं ने बताया कि

भगवान विष्णु के अनंत रूप की यह उपासना है। हम चौदह वर्षों तक इस व्रत को करते हैं और चौदह गाँठ वाला डोरा (अनंत सूत्र) बांधते हैं।

इससे सुख-समृद्धि और संतति की प्राप्ति होती है, जीवन में स्थिरता आती है। सुशीला के मन में यह सुनकर गहरी आस्था जागी। उसने वहीं स्नान किया, व्रत का संकल्प लिया, भगवान अनंत की पूजा की और चौदह गांठ वाला अनंत सूत्र हाथ में बाँध लिया।

वह आनंदित होकर अपने पति के पास आई और सब कुछ बताया। लेकिन ऋषि कौंडिन्य, जो पहले से ही अपमानित व परेशान थे, बोले – “यह सब अंधविश्वास है, इन धागों से क्या होगा?” और क्रोध में आकर उन्होंने सुशीला के हाथ से वह डोरा छीन लिया और अग्नि में फेंक दिया।

भगवान अनंत का अपमान करने से ऋषि कौंडिन्य की सारी संपत्ति नष्ट हो गई। घर में दरिद्रता छा गई। जहां पहले सुख था, वहाँ अब दुख और कलह का वास हो गया।

ऋषि कौंडिन्य दुखी होकर एक दिन अपनी पत्नी से बोले – “हमारे जीवन में यह विपत्ति क्यों आ गई?” तब सुशीला ने शांत स्वर में कहा – “स्वामी! आपने भगवान अनंत का डोरा अग्नि में डालकर उनका अनादर किया, इसी कारण यह सब हुआ है।”

यह सुनकर ऋषि कौण्डिन्य को गहरा पश्चाताप हुआ। वे बोले –“अब मैं क्या करूँ?”

सुशीला ने कहा –“आप अनंत भगवान को मनाएं। व्रत करें, उनसे क्षमा माँगें।” तब ऋषि कौण्डिन्य तपस्या करने वन में चले गए। कई दिनों तक वे बिना अन्न-जल के भटकते रहे।

अंततः थक-हारकर वे भूमि पर गिर पड़े। तभी भगवान विष्णु अनंत रूप में प्रकट हुए। उन्होंने कहा- “कौंडिन्य! तुमने मेरे अनंत सूत्र को अग्नि में डालकर अपमान किया, इसलिए तुम्हें यह दुख मिला। परंतु अब तुमने पश्चाताप किया है।

घर जाओ, चौदह वर्षों तक विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे और पुनः सुख-समृद्धि मिलेगी।” ऋषि कौंडिन्य ने चौदह वर्षों तक निरंतर यह किया।

व्रत के प्रभाव से उनके सभी दुख दूर हो गए, धन-धान्य, वैभव और शांति लौट आई।

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