फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्स स्टब ने पश्चिमी देशों को चेतावनी दी है कि यदि वे ग्लोबल साउथ और भारत जैसे देशों के साथ अधिक सहयोगी और सम्मानजनक विदेश नीति नहीं अपनाते हैं, तो हार का सामना करना पड़ सकता है।
स्टब ने यह बयान हाल ही में चीन के तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के संदर्भ में दिया।
उन्होंने इस सम्मेलन को पश्चिमी देशों के लिए आंख खोलने वाला बताया, जो वैश्विक स्तर पर बदलते शक्ति संतुलन को दर्शाता है।
एससीओ शिखर सम्मेलन और पश्चिम की चुनौतियां
चीन के तियानजिन में आयोजित 25वें एससीओ शिखर सम्मेलन में 20 से अधिक विश्व नेताओं और दस अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान जैसे प्रमुख नेता शामिल थे।
स्टब ने अपने बयान में कहा कि एससीओ पश्चिमी देशों की एकता को “कमजोर करने” की कोशिश कर रहा है, और यह पश्चिम के लिए एक चेतावनी है कि वे ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करें।
लिथुआनिया के राष्ट्रपति गितानस नौसेदा के साथ हेलसिंकी में एक बैठक के दौरान स्टब ने कहा, “मेरे यूरोपीय सहयोगियों और विशेष रूप से अमेरिका को मेरा संदेश है कि यदि हम ग्लोबल साउथ के देशों, जैसे कि भारत के प्रति अधिक एकजुट और सम्मानजनक विदेश नीति नहीं अपनाते, तो हम हार जाएंगे। चीन में यह एससीओ बैठक हमें याद दिलाती है कि दांव पर क्या है।”
ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका
राष्ट्रपति स्टब ने ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि ये देश, विशेष रूप से भारत, वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
उन्होंने पहले भी अपने भाषणों में इस बात पर जोर दिया है कि ग्लोबल साउथ को प्रभावित करने और उनके साथ सहयोग करने की आवश्यकता है, भले ही इसके लिए पश्चिम को अपने कुछ हितों से समझौता करना पड़े। 2024 में द इकोनॉमिस्ट को दिए एक इंटरव्यू में स्टब ने कहा था कि ग्लोबल साउथ को “प्रलोभन” देना होगा, ताकि वे पश्चिमी मूल्यों के साथ जुड़े रहें।
बता दें कि ग्लोबल साउथ एक भू-राजनीतिक और आर्थिक शब्द है, जिसका उपयोग उन देशों के लिए किया जाता है जो मुख्य रूप से विकासशील या उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले हैं और जो ऐतिहासिक, सामाजिक, और आर्थिक रूप से वैश्विक उत्तर से भिन्न हैं। ये देश आम तौर पर एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र में स्थित हैं।
एससीओ का बढ़ता प्रभाव और पश्चिम की चिंता
एससीओ में चीन, रूस, भारत, और मध्य एशियाई देश जैसे कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, और किर्गिस्तान शामिल हैं। इसने हाल के वर्षों में अपनी वैश्विक उपस्थिति को मजबूत किया है।
स्टब का मानना है कि यह संगठन पश्चिमी देशों की एकता को चुनौती दे रहा है और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहा है। रूसी सीनेटर अलेक्सी पुष्कोव ने स्टब के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि पश्चिम ग्लोबल साउथ के साथ संबंध सुधारने में असमर्थ है, क्योंकि उसकी नीतियां अभी भी औपनिवेशिक और आधिपत्यवादी हैं।
भारत की भूमिका पर विशेष ध्यान
स्टब ने भारत का विशेष रूप से जिक्र किया, जो एससीओ का एक प्रमुख सदस्य है और वैश्विक मंच पर तेजी से प्रभावशाली बन रहा है।
भारत ने हाल के समय में रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, साथ ही पश्चिमी देशों के साथ भी सहयोग बनाए रखा है।
स्टब ने 27 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक टेलीफोनिक बातचीत में रूस-यूक्रेन युद्ध के समाधान पर चर्चा की थी। उन्होंने कहा कि भारत एक सम्मानित और सुनी जाने वाली आवाज है, जो वैश्विक शांति और स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।