कॉलेजियम में जस्टिस बी वी नागरत्ना की कड़ी असहमति के बावजूद पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल पंचोली को पदोन्नति दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका ने कहा है कि इस मामले में जस्टिस बीवी नागरत्ना की असहमति के कारणों को जानने का जनता को अधिकार है।
इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस ओका ने इस बात पर भी सहमति जताई कि कॉलेजियम की मीटिंग में जस्टिस पंचोली पर जस्टिस नागरत्ना की असहमति का विवरण भी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए था।
उड़ीसा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर द्वारा संपादित पुस्तक “(इन) कम्प्लीट जस्टिस? द सुप्रीम कोर्ट एट 75” के विमोचन के अवसर पर जस्टिस ओका ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि अगर कॉलेजियम में एक भी सहमति है तो उस पर गौर किया जाना चाहिए।
इंदिरा जयसिंह ने पूछे थे सवाल
जयसिंह ने जस्टिस मुरलीधर और जस्टिस ओका और राजनीतिक विज्ञानी गोपाल गुरु वाले पैनल से कॉलेजियम की कार्यप्रणाली के बारे में पूछा, जो ‘गोपनीयता’ में काम करता है और वह ऐसे समय में ‘भारत के भावी प्रधान न्यायाधीशों के चयन के मानदंड’ के बारे में जानना चाहती थीं, जब उच्चतम न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश द्वारा असहमति जताई गई है।
पारदर्शिता और गोपनीयता में संतुलन भी जरूरी
जयसिंह के सवालों का जवाब देते हुए जस्टिस ओका ने कहा, “आप सही कह रही हैं कि एक जज ने असहमति जताई है। हमें यह जानना चाहिए कि वह असहमति क्या है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। आपको यह आलोचना करने का हक़ है कि वह असहमति सार्वजनिक क्यों नहीं हुई।”
इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि असहमति का खुलासा तो होना ही चाहिए, लेकिन कॉलेजियम की कार्यवाही में पूरी पारदर्शिता को पदोन्नति के लिए विचार किए जाने वाले वकीलों की गोपनीयता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, जिनमें से कई चयनित न होने पर वकालत की प्रैक्टिस में लौट जाते हैं।
वकीलों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है
जस्टिस ओका ने कहा, “यह सवाल बेहद चिंताजनक है, लेकिन मैं कहता रहा हूं कि हमें पारदर्शिता को परिभाषित करना होगा। ओका ने स्पष्ट किया कि यदि कॉलेजियम के विचार-विमर्श और विवरण को सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे उन वकीलों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने कॉलेजियम द्वारा विचार किए जाने के लिए सहमति दी है।
उन्होंने कहा, “अगर कॉलेजियम 10 या 15 वकीलों पर विचार करता है, जिनमें से 10 मामलों पर विचार किया जाता है और पांच की सिफ़ारिश नहीं की जाती, तो क्या हमें उन लोगों की निजता की चिंता नहीं है जिन्होंने स्वेच्छा से सहमति दी है? उन्हें वापस जाकर वकालत करनी होगी।”
कॉलेजियम ने की थी दो नामों की सिफारिश
उन्होंने कहा कि एक बार जब ये मामले सार्वजनिक हो जाते हैं, तो इन व्यक्तियों का पिछले तीन वर्षों का वेतन भी सार्वजनिक हो जाता है। उन्होंने कहा, “इसलिए हमें इसे गोपनीयता के साथ संतुलित करना होगा।”
बता दें कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी आर गवई की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने 25 अगस्त को बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल पंचोली के नामों की पदोन्नति के लिए सिफ़ारिश की थी, जिसे केंद्र सरकार ने बुधवार को मंजूर कर लिया।
जस्टिस नागरत्ना की असहमति क्या?
सूत्रों ने बताया कि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने पंचोली की अपेक्षाकृत कम वरिष्ठता, जुलाई 2023 में गुजरात से पटना उच्च न्यायालय में उनके स्थानांतरण पर सवाल और उच्चतम न्यायालय में प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय असंतुलन की चिंताओं का हवाला देते हुए सिफारिश का विरोध किया था।
अब जस्टिस पंचोली अगर सुप्रीम कोर्ट में जज बनते हैं तो जस्टिस जॉयमाल्या बागची की सेवानिवृत्ति के बाद अक्टूबर 2031 में वह देश के प्रधान न्यायाधीश बनने की दौड़ में शामिल हो जाएंगे।