व्लादिमीर पुतिन की बड़ी जीत, नाटो देश में ही उनसे मिलेंगे ट्रंप और जेलेंस्की…

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों कूटनीतिक मोर्चे पर लगातार मजबूत बढ़त बनाए हुए हैं।

पहले अमेरिका के न्यौते पर अलास्का गए तो अपनी ही शर्तों पर वार्ता करके लौटे। यही नहीं डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि यूक्रेन क्रीमिया समेत कुछ हिस्सा रूस को देने पर सहमत हो जाए और उसके साथ ही स्थायी तौर पर जंग खत्म करने पर सहमति बने।

ऐसा होता है तो यह व्लादिमीर पुतिन के लिए निजी जीत होगी और वह अखंड रूस के सपने की ओर एक कदम बढ़ाते दिखेंगे। अब एक और खबर है कि अमेरिका अगली त्रिपक्षीय मीटिंग हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में करना चाहता है। यदि ऐसा हुआ तो यह भी व्लादिमीर पुतिन की ही जीत मानी जाएगी।

ऐसा इसलिए कि यूक्रेन और रूस की जंग में हंगरी लगातार रूस का समर्थन करता रहा है। दिलचस्प बात यह है कि हंगरी उस नाटो का भी मेंबर है, जिसकी अगुवाई अमेरिका करता है।

इस संगठन को परंपरागत तौर पर रूस विरोधी माना जाता है, लेकिन जंग में हंगरी ने लगातार यूक्रेन पर ही निशाना साधा है और उसे युद्ध विराम की सलाह दी है।

अब यदि उसी देश में त्रिपक्षीय मीटिंग होती है तो यह रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए निजी जीत होगी। उनके हंगरी के पीएम विक्टर ऑर्बन से बहुत अच्छे रिश्ते हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हंगरी के अमेरिका के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं और रूस से भी वह बनाकर चल रहा है।

ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप मानते हैं कि हंगरी ही त्रिपक्षीय वार्ता के लिए अनुकूल देश है। हालांकि यूक्रेन के लिए यह चिंता की बात है क्योंकि उसके रिश्ते हंगरी से बहुत अच्छे नहीं हैं।

Politico की रिपोर्ट के अनुसार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और फ्रेंच राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भी जल्दी ही एक मीटिंग होने जा रही है। बता दें कि इस बीच स्विट्जरलैंड ने भी मध्यस्थता के लिए होस्ट बनने की इच्छा जाहिर की है। बुडापेस्ट में मीटिंग यूक्रेन के लिए 30 साल पुरानी यादें भी ताजा करेगी, जब उसे ब्रिटेन, अमेरिका और रूस ने संप्रभुता प्रदान करने पर सहमति जताई थी। इसके अलावा उससे परमाणु हथियारों को भी त्यागने को राजी कर लिया था।

माना जाता है कि परमाणु हथियारों को त्यागने के बाद से ही यूक्रेन की स्थिति कमजोर हुई है और वह रूस के मुकाबले जंग में पहले जैसी स्थिति में नहीं है।

बता दें कि पिछले दिनों हंगरी ने यूक्रेन की तब आलोचना की थी, जब रूस की तेल पाइपलाइन पर अटैक हुवआ था। हंगरी का कहना था कि ऐसा करना गलत है। इस पर यूक्रेन ने कहा था कि जंग की शुरुआत हमने नहीं की है। यदि कोई दिक्कत है तो हंगरी को शिकायत रूस से करनी चाहिए।

यह दिलचस्प तथ्य है कि नाटो का मेंबर होते हुए भी हंगरी लगातार रूस का ही समर्थन करता रहा है और उससे तेल की भी बड़े पैमाने पर खरीद की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *