लंदन में चीन, यूरोप का सबसे बड़ा दूतावास बनाने की तैयारी में है।
दूसरी ओर इसको लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। दरअसल, मध्य लंदन में ऐतिहासिक रॉयल मिंट कोर्ट स्थल पर चीन की तथाकथित ‘मेगा-दूतावास’ बनाने की योजना है।
अब इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहा है। प्रदर्शन करने वालों ने चेतावनी दी है कि इसका उपयोग ब्रिटेन में तिब्बती समुदाय सहित चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के विरोधियों पर ‘निगरानी और उत्पीड़न’ के लिए किया जाएगा।
फ्री तिब्बत के एक्स पोस्ट से खुलासा
लंदन स्थित समूह फ्री तिब्बत ने एक्स पर कई पोस्ट में खुलासा किया कि ब्रिटेन सरकार पहले इस दूतावास को मंजूरी देने को तैयार थी। हालांकि अब इसके आकार, गोपनीयता और स्थानीय निवासियों पर प्रभाव को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं।
फ्री तिब्बत की एक पोस्ट में कहा गया कि ‘नो मेगा-एम्बेसी’ बैनर के तहत हुए विरोध प्रदर्शनों ने लंदन के कई हिस्सों में यातायात ठप कर दिया, जहां प्रदर्शनकारी प्रमुख चौराहों पर जमा हुए और घंटों तक ट्रैफिक बाधित किया।
‘मेगा-दूतावास’ बहुआयामी खतरा
विरोध करने वालों में तिब्बती, उइगर, हांगकांगवासी, मंगोल, ताइवानी, चीनी असंतुष्ट, टावर हैमलेट्स के निवासी, स्थानीय पार्षद, सांसद और कानून प्रवर्तन समुदाय के सदस्य शामिल हैं।
फ्री तिब्बत ने एक पोस्ट में कहा गया है कि लंदन में चीन का प्रस्तावित ‘मेगा-दूतावास’ सिर्फ एक विशाल राजनयिक भवन नहीं है, यह एक बहुआयामी खतरा है। पोस्ट में आगे कहा गया कि योजनाओं के प्रमुख विवरण हटाए जाने के कारण, इस स्थान का उपयोग ब्रिटेन में तिब्बती समुदाय सहित सीसीपी के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर निगरानी और उत्पीड़न के लिए किया जा सकता है।
बड़े पैमाने पर विरोध का आह्वान
फ्री तिब्बत ने तर्क दिया कि यह विशाल दूतावास बीजिंग की ब्रिटिश धरती पर निगरानी, धमकी और दमन की क्षमता को काफी बढ़ा देगा।
संगठन ने कहा कि 2019 से तिब्बती कार्यकर्ता, सहयोगी समूहों के साथ, लंदन के केंद्र में सीसीपी के विस्तार के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे हैं।
फ्री तिब्बत ने इस परियोजना के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध का आह्वान किया और समुदायों से लंदन में एकत्र होने का आग्रह किया, ताकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए खतरनाक आधार बनने से रोका जा सके।
तिब्बत पर 1950 से चीन पर कब्जा
बता दें कि 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया था, जिसके बाद दशकों तक प्रतिरोध जारी है। तिब्बतियों को धर्म, संस्कृति और भाषा के दमन का सामना करना पड़ रहा है।
जबकि बीजिंग इन पर नियंत्रण कड़ा कर रहा है। वहीं, दुनिया भर में निर्वासित तिब्बती स्वतंत्रता, अधिकारों और आत्मनिर्णय की मांग कर रहे हैं, और बीजिंग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।