बिहार में हो रहे एसआईआर और मतदाता सूचियों में कथित धांधली के खिलाफ विपक्षी सांसदों के मार्च को आज रोक दिया गया और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
जानिए क्या है पूरा मामला।
बिहार में मतदाता सूची संशोधन यानी एसआईआर के विरोध में विपक्षी सांसदों ने संसद भवन से चुनाव आयोग कार्यालय तक विरोध मार्च निकालने की कोशिश की।
लेकिन विपक्षी सांसद पोस्टर-बैनर लेकर नारेबाजी करते हुए जैसे ही संसद भवन परिसर के बाहर कुछ दूर पहुंचे, दिल्ली पुलिस ने उन्हें रोक लिया।
दिल्ली पुलिस ने विपक्षी सांसदों को रोकने के लिए संसद से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर ही बैरिकेड्स लगा रखे थे और वहां से आगे बढ़ने से रोक दिया।
पुलिस का कहना था कि विपक्षी सांसदों की ओर से इस मार्च के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी।लेकिन पुलिस की ओर से रोके जाने के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा समेत कई सांसदों ने बैरिकेड्स पर चढ़ने की कोशिश की।
कुछ सांसद बैरिकेड्स कूदकर बीच सड़क पर धरने पर बैठ गए।
पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे सांसदों को समझाने की कोशिश की, लेकिन थोड़ी देर बाद सभी सांसदों को हिरासत में ले लिया गया।
वहां से सांसदों को संसद मार्ग थाना लाया गया जहां से कुछ देर बाद सभी सांसदों को रिहा कर दिया गया।सांसद थाने में भी विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी करते रहे।
दरअसल, संसद भवन परिसर में मॉनसून सत्र की शुरुआत से ही यानी 31 जुलाई से ही एसआईआर के खिलाफ विपक्ष विरोध प्रदर्शन कर रहा है।
विपक्ष की मांग है कि सदन में एसआईआर और कथित “वोट चोरी” पर चर्चा कराई जाए लेकिन सरकार इस मुद्दे पर चर्चा को तैयार नहीं है।
इसकी वजह से हर रोज संसद की कार्यवाही भी बाधित हो रही है।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की इस कवायद का मकसद इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करना है।
बिहार में 65 लाख मतदाता कैसे गायब हुए?चुनाव आयोग ने एसआईआर के पहले चरण के बाद जो ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की है उसमें 65 लाख मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं।
इसे लेकर काफी विवाद हो रहा है और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में भी इस बारे में कई याचिकाएं दायर की गई हैं जिन पर सुनवाई चल रही है।मंगलवार से सुप्रीम कोर्ट इस मामले की फिर सुनवाई शुरू करेगा।
सोमवार को विपक्ष ने तय किया था कि इंडिया गठबंधन के सभी सांसद संसद भवन से लेकर चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च करेंगे और फिर चुनाव आयोग से इस बारे में मुलाकात करेंगे।
कांग्रेस पार्टी के नेता जयराम रमेश ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मुलाकात का समय भी मांगा था।
बिहार में शिक्षकों की भर्ती के लिए डोमिसाइल नीति की घोषणाचुनाव आयोग ने कांग्रेस नेता जयराम रमेश को पत्र लिखकर दोपहर साढ़े बारह बजे मिलने के लिए बुलाया था।
चुनाव आयोग ने उनसे कहा था कि वो अपने साथ अधिकतम 30 सांसदों को लेकर आएं और आने से पहले उन सभी सांसदों की सूचना दें।
पुलिस का कहना था कि सिर्फ सांसदों को ही चुनाव आयोग तक जाने की अनुमति थी लेकिन विपक्ष के सभी सांसद मार्च में शामिल थे।
विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलीनई दिल्ली के संयुक्त पुलिस आयुक्त दीपक पुरोहित ने मीडिया को बताया, “यहां विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी, लेकिन हमें सूचना मिल गई थी कि विरोध प्रदर्शन हो रहा है।
चुनाव आयोग से सिर्फ तीस सांसदों की अनुमति थी लेकिन सांसदों की संख्या काफी ज्यादा थी इसलिए उन्हें हिरासत में लेना पड़ा।
चुनाव आयोग से तीस सांसदों की अनुमति है और जब हमें उनके नाम मिल जाएंगे, तो हम उन्हें चुनाव आयोग के पास ले जाएंगे”लेकिन विपक्ष का कहना था कि वो लोग तो चुनाव आयोग दफ्तर तक मार्च कर रहे थे और इसकी सूचना भी दी गई थी, फिर उन्हें क्यों रोका गया।
कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना था कि सरकार डरी हुई है और “वोट चोरी” का पर्दाफाश होने के बाद वो इस पर चर्चा से बच रही है।
वहीं चुनाव आयोग को इस बारे में पत्र लिखने वाले कांग्रेस सांसद जयराम रमेश का कहना था, “चुनाव आयोग को लिखा मेरा पत्र सीधा था।
मैंने साफ-साफ लिखा था कि सभी विपक्षी सांसद संसद से चुनाव आयोग तक शांतिपूर्ण मार्च निकालेंगे।सभी सांसद चुनाव आयोग को एसआईआर के बारे में एक दस्तावेज देना चाहते हैं।
यही हमारी मांग थी।मैंने कल शाम यह पत्र लिखा था लेकिन चुनाव आयोग ने मुझे कोई जवाब नहीं दिया।और अब वो कह रहे हैं कि सिर्फ 30 सांसद ही आ सकते हैं।
हमें रोक दिया गया है, चुनाव आयोग नहीं जाने दिया जा रहा है”निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकायभारत में संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है जो एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है और देश भर में संघ और राज्य निर्वाचन प्रक्रियाओं को संचालित करता है।
निर्वाचन आयोग भारत में लोक सभा, राज्य सभा, राज्यों की विधान सभाओं, देश में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों के लिए होने वाले निर्वाचनों का भी संचालन करता है।
भारत: सुप्रीम कोर्ट ने कहा ईवीएम डाटा डिलीट न करेंपिछले कुछ समय से निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और पारदर्शिता पर काफी सवाल उठ रहे हैं।विपक्ष निर्वाचन आयोग पर इस बात के लिए हमलावर है कि वो सत्तारूढ़ पार्टी के साथ मिलकर उसी के हित में काम कर रहा है।
हाल ही में बेंगलुरु सेंट्रल सीट की एक विधानसभा सीट महादेवपुरा में मतदाता सूची की कांग्रेस पार्टी ने पड़ताल की थी और पार्टी नेता राहुल गांधी ने उस पड़ताल के जरिए आरोप लगाया कि उस एक विधानसभा चुनाव में एक लाख से ज्यादा वोट फर्जी थे और उन्हीं फर्जी वोटों की बदौलत बेंगलुरु पश्चिम सीट पर बीजेपी उम्मीदवार की जीत हुई थी।
हालांकि चुनाव आयोग इन आरोपों को नकार रहा है। कैसे होता है निर्वाचन आयुक्तों का चयन?साल 1989 तक भारत में एक ही चुनाव आयुक्त होता था।
बाद में संसद में एक अधिनियम लाया गया जिसके मुताबिक, दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों के पद जोड़े गए। नए नियम के अनुसार एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो इलेक्शन कमिश्नर होते हैं।
सरकार ने 1 अक्टूबर 1993 को चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय निकाय बनाया। कानून के मुताबिक, भारत निर्वाचन आयोग का मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के लिए किसी भी व्यक्ति को उससे पहले भारत सरकार का सेक्रेटरी लेवल का अफसर होना जरूरी है।
2023 से पहले सरकार वरिष्ठ अधिकारियों के पैनल में से ही निर्वाचन आयुक्त और मुख्य निर्वाचन आयुक्त का चयन करती थी लेकिन दो साल पहले इसके लिए एक नया कानून लाया गया।
बिहार में अपराध के बढ़ते आंकड़े क्या कह रहे हैंयह अधिनियम उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आया, जब विभिन्न याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में केंद्र सरकार की विशेष शक्ति को चुनौती दी गई।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि जब तक इस बारे में संसद में कोई कानून न बन जाए तब तक प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश का एक पैनल मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का चयन करेगा।
फैसले से पहले, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी।
कानून को लेकर विवादसरकार ने जो कानून बनाया उसमें प्रावधान किया गया कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी होगी जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त एक केंद्रीय मंत्री होंगे।
यह तीन सदस्यीय कमेटी चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की सिफारिश करेगी। इस कानून का यह कहकर विरोध हुआ कि इसमें सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुझाए गए पैनल को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया और केंद्रीय मंत्री को रख दिया गया।
इस वजह से इस समिति की निष्पक्षता सवालों के घेरे में है। क्या आधार कार्ड से होगी बिहार का वोटर होने की पुष्टिहालांकि विपक्ष के विरोध के बावजूद कानून पारित हो गया और मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति इसी कानून के मुताबिक इसी साल फरवरी में कर दी गई।
कौन हैं ज्ञानेश कुमार?ज्ञानेश कुमार का लंबा प्रशासनिक अनुभव रहा है लेकिन मौजूदा सरकार के बेहद करीबी होने की वजह से उनकी नियुक्ति के समय से ही सवाल उठते रहे हैं।
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अफसर हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले वे चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
इससे पहले ज्ञानेश कुमार सहकारिता मंत्रालय में सचिव के पद पर कार्यरत थे और चुनाव आयुक्त बनने से कुछ समय पहले ही रिटायर हुए थे। ज्ञानेश कुमार जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने जैसे अहम फैसलों का भी हिस्सा रहे हैं।
यही नहीं, उन्होंने संसदीय कार्य मंत्रालय के साथ ही गृह मंत्रालय में भी प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाली है।मुख्य निर्वाचन आयुक्त के तौर पर उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक रहेगा।