जब रूस ने अमेरिका के करीब तैनात की थीं परमाणु मिसाइलें, दहल उठी थी दुनिया; क्या अब ट्रंप करेंगे पलटवार?…

साल 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट विश्व इतिहास के उन पलों में से एक था, जब पूरी दुनिया सांस थामे खड़ी थी।

उस समय सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात की थीं, जो अमेरिका के लिए सीधा खतरा थीं। आज 2025 में एक बार फिर रूस और अमेरिका के बीच तनाव अपने चरम पर है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के नजदीक दो परमाणु पनडुब्बियों को तैनात करने का आदेश दिया है, जिसे कई लोग क्यूबा संकट की याद दिलाने वाला कदम बता रहे हैं।

क्या यह 1962 की घटना का “बदला” है, या फिर वैश्विक शक्ति संतुलन का एक नया खेल? आइए विस्तार से समझते हैं।

1962 का क्यूबा मिसाइल संकट: जब हिल गई थी दुनिया

क्यूबा मिसाइल संकट 1962 में शीत युद्ध के दौरान का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संकट था। यह अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव का परिणाम था। इसे 20वीं सदी का सबसे खतरनाक क्षण माना जाता है, क्योंकि यह विश्व को परमाणु युद्ध के कगार पर ले गया था।

1960 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक और सैन्य प्रतिद्वंद्विता चरम पर थी। 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्रांति के बाद, क्यूबा ने सोवियत संघ के साथ गठबंधन किया।

इससे अमेरिका चिंतित हो गया, क्योंकि क्यूबा अमेरिका के तट से केवल 90 मील दूर था। अमेरिका द्वारा समर्थित क्यूबा के निर्वासितों ने कास्त्रो सरकार को उखाड़ फेंकने की असफल कोशिश की, जिससे क्यूबा और सोवियत संघ के बीच संबंध और मजबूत हुए।

1962 में, सोवियत संघ ने गुप्त रूप से क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात करनी शुरू कीं, जो अमेरिका के कई शहरों को निशाना बना सकती थीं।

यह कदम सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने अमेरिका के तुर्की और इटली में तैनात मिसाइलों के जवाब में उठाया। 14 अक्टूबर 1962 को अमेरिकी U-2 जासूसी विमान ने क्यूबा में मिसाइल स्थलों की तस्वीरें लीं, जिससे संकट शुरू हुआ।

राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने 22 अक्टूबर को सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि क्यूबा में सोवियत मिसाइलें हैं और उन्होंने क्यूबा के आसपास नौसैनिक नाकाबंदी लागू की, ताकि और मिसाइलें न पहुंचें।

दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। सोवियत जहाज नाकाबंदी की ओर बढ़े, और दुनिया परमाणु युद्ध की आशंका से डर गई। गुप्त और सीधी बातचीत के जरिए, कैनेडी और ख्रुश्चेव ने संकट को हल करने की कोशिश की।

आखिरकार, 28 अक्टूबर को ख्रुश्चेव ने घोषणा की कि सोवियत संघ क्यूबा से मिसाइलें हटा लेगा, बशर्ते अमेरिका क्यूबा पर हमला न करे। गुप्त रूप से, अमेरिका ने तुर्की से अपनी मिसाइलें हटाने का भी वादा किया।

इस समझौते ने दुनिया को परमाणु युद्ध की तबाही से बचा लिया। यह संकट शीत युद्ध का प्रतीक बन गया, जिसमें दोनों देशों ने अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की, लेकिन समझदारी ने आखिरकार युद्ध को टाल दिया। लेकिन आज, 2025 में, रूस और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव फिर से दुनिया को उस दौर की याद दिला रहा है।

ताजा तनाव: ट्रंप का परमाणु पनडुब्बी वाला दांव

1 अगस्त को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के नजदीक दो परमाणु पनडुब्बियों को तैनात करने का ऐलान किया। यह कदम रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव की धमकियों के जवाब में उठाया गया।

मेदवेदेव ने ट्रंप पर “अल्टीमेटम का खेल” खेलने का आरोप लगाया था और रूस की परमाणु ताकत का जिक्र करते हुए चेतावनी दी थी कि रूस कोई छोटा देश नहीं है जो चुप रहेगा। ट्रंप के इस कदम ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है।

क्यों बढ़ा तनाव? ताजा घटनाक्रम से समझते हैं

रूस-यूक्रेन युद्ध: रूस और यूक्रेन के बीच 2022 से चल रहा युद्ध इस तनाव की जड़ में है। ट्रंप ने हाल ही में यूक्रेन को आधुनिक हथियार, जैसे पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम देने का ऐलान किया जिससे रूस भड़क गया। रूस ने इसे युद्ध को और भड़काने वाला कदम बताया और अपनी परमाणु नीति को सक्रिय करने की बात कही थी।

मेदवेदेव की धमकियां: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी मेदवेदेव ने ट्रंप को चेतावनी दी कि रूस पर नए प्रतिबंध लगाना और यूक्रेन को हथियार देना युद्ध की ओर ले जाएगा। उन्होंने रूस के “डेड हैंड” सिस्टम का जिक्र किया, जो एक ऑटोमैटिक परमाणु प्रतिक्रिया प्रणाली है। इससे दुनिया में परमाणु युद्ध का डर और बढ़ गया।

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