सावन: जब भगवान शिव ने विष पीकर बचाया संसार, जानिए सावन माह की पौराणिक कथाएं…

प्रियंका प्रसाद (ज्योतिष सलाहकार): केवल व्हाट्सएप मेसेज 94064 20131

श्रावण मास में मां पार्वती ने अपनी तपस्या से शिव को प्रसन्न कर उन्हें वर रूप में प्राप्त किया था।

इस माह में ही शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान किया था। श्रावण माहात्म्य का वर्णन श्रावण मास से जुड़ी पौराणिक कथाओं का वर्णन किए बिना पूरा नहीं होता। इससे जुड़ी कुछ पौराणिक कथाएं-

सावन में ससुराल आते हैं शिव

पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां पार्वती ने श्रावण मास में ही कठिन व्रत, उपवास एवं तपस्या करके शिव को प्रसन्न करके उनसे विवाह का वर प्राप्त किया था।

श्रावण मास की एक कथा यह भी है कि भगवान शिव श्रावण मास में ही विवाहोपरांत पहली बार पृथ्वी पर अपनी ससुराल गए थे। वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं।

कालकूट विष का पान किया

पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन माह में ही समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मंथन से जो कालकूट विष निकला, उससे जगत की रक्षा करने के लिए शिव ने उसका पान किया और नीलकंठ कहलाए।

विष के ताप को शांत करने के लिए सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, असुर, दैत्य, नाग आदि महादेव का जलाभिषेक करते हैं। कालांतर में शिव के लिंग स्वरूप का जलाभिषेक किया जाने लगा। सावन माह में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

ऋषि मार्कंडेय की पूर्ण हुई तपस्या
कुछ मान्यताओं में मार्कंडेय ऋषि की तपस्या को भी श्रावण माह से जोड़ते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार मार्कंडेय ऋषि अल्पायु थे। अपने पिता मरकंड ऋषि की आज्ञा से मार्कंडेय ने शिव को अपनी आराधना से प्रसन्न किया और लंबी आयु पाई। ऐसा कहा जाता है कि यह तपस्या श्रावण मास में ही पूर्ण हुई थी।

रहस्य साधना में गूढ़ अर्थ

श्रावण मास सनातन पंचांग वर्ष का पांचवां माह है। इसका भी एक रहस्यवादी गूढ़ार्थ है। वस्तुतः सनातन धर्म में प्रायः पांच और तीन के दो सामानांतर रूपकों में समस्त आध्यात्मिक दर्शन अभिव्यक्त है। समस्त सनातन कथाओं में गूढ़ दर्शन की अभिव्यक्ति संस्कारों एवं कथाओं में वर्णित है।

भगवान शिव की आराधना में त्रिशूल, त्रिपुंड, बिल्व त्रिपत्र, त्रिनेत्र, त्रिपुर संहार का स्वरूप स्पष्ट रूपक हैं। वृहत्तर सनातन विमर्श में ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेवों का वर्णन, तीनों लोकों का वर्णन, सत, रज और तम त्रिगुण का वर्णन भी स्पष्ट है।

वहीं पंचनाद, पंचध्वनि, पंचवदन स्वरूप आदि के रूपक पांच की महत्ता को भी दर्शाते हैं। इसी प्रकार पंचवायु, पंचकोश, पंचानन आराधना, पंचतत्व इत्यादि हैं। भगवान शिव की पंचाक्षर मंत्र आराधना का भी विशेष महत्व है।

इन अर्थों के संकेत स्वरूप में भी श्रावण मास का पंचांग वर्ष के पांचवें माह के रूप में होना मात्र संयोग न हो कर सनातन रहस्य साधना के प्रतीकों में से एक है।

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